|
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह । सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥ २३ ॥
इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो तत्त्व से जानता है, वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता ।
|
|
|
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ २४ ॥
उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य शुद्ध हुई बुद्धि से ध्यान के द्वारा हृदय में देखते है, अन्य ज्ञानयोग के द्वारा तो कुछ कर्मयोग के द्वारा उसे देखते है - प्राप्त करते है ।
|
|
अन्ये त्वेवमजान्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते । तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥ २५ ॥
जो मंद बुद्धिवाले पुरुष हैं, वो तत्व को जानने वाले पुरुषों से उस तत्व के बारे में सुनकर तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरुप संसार सागर को निःसन्देह तर जाते है ।
|
|
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥
हे अर्जुन ! जितने भी स्थावर – जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान ।
|
|
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥
जो नष्ट होते हुए सब भूतो में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है ।
|
|
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥
क्योंकि जो पुरुष सब में समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है ।
|
|
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः । यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥ २९ ॥
जो पुरुष सभी कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है ।
|
|
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥
जिस क्षण पुरुष भूतों के पृथक – पृथक भावों को एक परमात्मा में स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह ब्रह्म को प्राप्त होता है ।
|
|
|
|
|
<< प्रारंभ करना < पीछे 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 अगला > अंत >>
|
|
पृष्ठ 9 का 40 |