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मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते । स गुणान्समतीत्यैतांब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २६ ॥
जो पुरुष अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मुझ को भजता है, वह तीनों गुणों को लाँघकर ब्रह्म को प्राप्त होने के लिये योग्य बन जाता है ॥ २६ ॥
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ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च । शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥ २७ ॥
क्योंकि उस अविनाशी ब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ ॥ २७ ॥
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श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौंन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवान् बोले, "हे अर्जुन ! यह शरीर "क्षेत्र " इस नाम से कहा जाता है, और जानने वाले तत्त्व को ज्ञानीजन "क्षेत्रज्ञ" कहते है" ।
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क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
हे अर्जुन ! सभी क्षेत्रों में (शरीर में) तु मुझे क्षेत्रज्ञ जान और प्रकृति एवं पुरुषको तत्वसे जानना यानी "ज्ञान" - एसा मेरा मत है ।
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तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् । स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु ॥ ३ ॥
क्षेत्र उसके विकार सहित और क्षेत्रज्ञ उसके प्रभाव सहित अब संक्षेपमें मुझसे सुन ।
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ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
क्षेत्र − क्षेत्रज्ञ का तत्त्व ऋषियोंद्वारा, वेदमन्त्रोंद्वारा, ब्रह्मसूत्रके पदों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है ।
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महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियोंके विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रुप, और गंध −।
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इच्छा द्वेषः सुखं दुखं सङघातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमदाहृतम् ॥ ६ ॥
तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थुल देह की पिण्ड चेतना और धृति - इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्र संक्षेपमें कहा गया है ।
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