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उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुष: ॥ १० ॥
शरीर को छोडकर जाते हुए या फिर शरीर में रहकर भोगते हुए जीवात्मा को अज्ञानी जन नहीं जानते, केवल ज्ञानरुप नेत्रोंवाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से उसे जानते हैं ।
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यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतस: ॥ ११ ॥
यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदयमें स्थित इस आत्मा को तत्वसे जानते हैं, किंतु मलिन अंत:करण वाले अज्ञानीजन यत्न करने पर भी उसे नहीं जान पाते ।
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यदादित्यगतं तेजो जगद्भासायतेऽखिलम् । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
सूर्यमें रहा हुआ तेज जो संम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा चन्द्रमा और अग्निमें रहा हुआ जो तेज है – उसे तू मेरा ही तेज जान ।
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गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधी: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्मक: ॥ १३ ॥
और पृथ्वी में प्रवेश करके मैं ही अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और रसस्वरुप अमृतमय चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण वनस्पतियोंको पुष्ट करता हूँ ।
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अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रित: । प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
सब प्राणीयों के देह में वैश्वानर अग्नि होकर, प्राण और अपान के साथ मिलकर चार प्रकार के अन्न (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) मैं ही पचाता हूँ ।
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो- मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो- वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५ ॥
मैं ही सबके हृदय में अन्तर्यामी रुप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उसका अभाव होता है; और सब वेदों द्वारा जानने योग्य भी मैं ही हूँ तथा वेदांत का कर्ता और वेदोंको जानने वाला मैं ही हूँ ।
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द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६ ॥
इस संसारमें दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर अर्थात् विनाशी और अक्षर याने अविनाशी । इनमें भूतप्राणीयों के शरीर हैं वे विनाशी हैं और उनके भीतर रहा हुआ जीवात्मा अविनाशी ।
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उतम: पुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
(पर) "परमात्मा" की संज्ञा से शास्त्रों ने कहा हुआ उत्तम पुरुष तो इन दोनों से अन्य ही है, जो तीनो लोकोमें प्रवेश करके सबका पोषण करता है एवं अविनाशी और परमेश्वर है ।
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