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शुचित्वं त्यागिता शौर्यं मुद्रण ई-मेल
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः ।
दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥

प्रामाणिकता, औदार्य, शौर्य, सुख-दुःख में समरस होना, दक्षता, प्रेम, और सत्यता – ये मित्र के सात गुण हैं ।

 
रसो रुधिरं मांसश्च मेदो मुद्रण ई-मेल
रसो रुधिरं मांसश्च मेदो मज्जास्थिरेतसः ।
सप्त धातव इमे प्रोक्ताः सर्व देह समाश्रिताः ॥

रस, खून, मांस, मेद, मज्जा, अस्थि, और शुक्र – ये सात प्रकार के धातु शरीर में होते हैं ।

 
बह्वाशी स्वल्पसंतुष्टः सुनिद्रः मुद्रण ई-मेल
बह्वाशी स्वल्पसंतुष्टः सुनिद्रः शीघ्रचेतनः ।
प्रभु भक्तश्च शूरश्च ज्ञातव्याः षट् शुनो गुणाः ॥

खूब खाना, कम में संतुष्ट होना, गहरा सोना, सदा जाग्रत, स्वामी भक्त, और शौर्य – ये छे श्वान (कूत्ते) के गुन हैं ।

 
अग्निदो गरदश्वैव मुद्रण ई-मेल
अग्निदो गरदश्वैव शस्त्रपाणि र्धनापहा ।
क्षेत्रदार हरश्चैव षडेत आततायिनः ॥

घर जलानेवाला, झहर देनेवाला, शस्त्र लेकर मारने आनेवाला, धन लूंटनेवाला, स्त्री हरण करनेवाला, खेत/जागीर हरनेवाला – ये सब आततायी हैं ।

 
मौनं कालविलम्बश्च प्रयाणं मुद्रण ई-मेल
मौनं कालविलम्बश्च प्रयाणं भूमिदर्शनम् ।
भुकुट्यन्य मुखी वार्ता नकाराः षड्विधाः स्मृताः ॥

मौन, विलंब, चले जाना, नीचे देखना, भँवर चढाना, और विषयांतर करना, ये छे नकार के तरीकें हैं ।

 
मेधावी वाक्पटुः धीरो मुद्रण ई-मेल
मेधावी वाक्पटुः धीरो लघुहस्तो जितेन्द्रियः ।
परशास्त्रपरिज्ञाता एष लेखक उच्यते ॥

बुद्धिमान, वाक्पटु, धीर, शीघ्र लिखनेवाला, संयमी, और अन्य शास्त्रों को पूर्णरुप से जाननेवाले को लेखक कहते हैं ।

 
भक्ष्यं भोज्यं च पेयम् च मुद्रण ई-मेल
भक्ष्यं भोज्यं च पेयम् च लेह्यं चोष्यं च पिच्छिलम् ।
इति भेदाः षडन्नस्य मधुराद्याश्च षड्रसाः ॥

अन्न के छे मधुर रसों का विभाजन इस प्रकार है – चबाने योग्य, निगलने योग्य, पीने योग्य, चाटने योग्य, चूसने योग्य, और चिकना ।

 
श्रीरागोऽथ वसन्तश्च मुद्रण ई-मेल
श्रीरागोऽथ वसन्तश्च भैरवः पञ्चमस्तथा ।
मेघरागो बृहन्नाटो षडेते पुरुषाः स्मृताः ॥

श्री, वसंत, भैरव, पंचम, मेघमल्हार, और बृहन्नाट ये गायन शास्त्र के छे पुरुष राग हैं ।

 
सुस्वरं सुरसं चैव मुद्रण ई-मेल
सुस्वरं सुरसं चैव सुरागं मधुराक्षरं ।
सालङ्कारं सप्रमाणं षड्विधं गानलक्षणम् ॥

स्वरयुक्त, रसयुक्त, रागसभर, मधुर शब्दोंवाला, अलंकारयुक्त और सप्रमाण, ऐसे गाने में छे लक्षण होने चाहिए ।

 
सीदन्ति सन्तः विलसन्त्यसन्तः मुद्रण ई-मेल
सीदन्ति सन्तः विलसन्त्यसन्तः
पुत्रा म्रियन्ते जनकश्चिरायुः ।
परेषु मैत्री स्वजनेषु वैरं
पश्यन्तु लोक कालि कौतुकानि ॥

संत दुःखी और असंत विलास करे, पुत्र अल्पायु और पिता दीर्घायु, परायों से मैत्री पर स्वजनों से बैर, जगत में कलि के ऐसे कौतुक होते हैं ।

 
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