कीर्तिनृत्यति नर्तकीव भुवने मुद्रण
कीर्तिनृत्यति नर्तकीव भुवने विद्योतते साधुता
ज्योत्स्नेव प्रतिभा सभासु सरसा गंगेव संमीलति ।
चित्तं रज्जयति प्रियेव सततं संपत् प्रसादोचिता
संगत्या न भवेत् सतां किल भवेत् किं किं न लोकोत्तरम् ॥

कीर्ति नर्तकी की तरह नृत्य करती है । दुनिया में साधुता प्रकाशित होती है । सभा में ज्योत्सना जैसी सुंदर प्रतिभा गंगा की तरह आ मिलती है, चित्तको प्रियाकी तरह आनंद देती है, प्रसादोचित् संपद आती है । अच्छे मानव के सहवास से कौनसा लोकोत्तर कार्य नहीं होता ?