असतां संगपंकेन यन्मनो मुद्रण
असतां संगपंकेन यन्मनो मलिनीक्र्तम् ।
तन्मेऽद्य निर्मलीभूतं साधुसंबंधवारिणा ॥

कीचड जैसे दुर्जन के संग से मलिन हुआ मेरा मन आज साधुसंगरुपी पानी से निर्मल बना ।