| एकतः काञनो मेरुः |
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एकतः काञनो मेरुः बहुरत्ना वसुन्धरा । एकतो भयभीतस्य प्राणिनः प्राणरक्षणम् ॥ (तराजु के) एक पलडे में सुवर्ण का मेरु पर्वत, और बहुरत्ना वसुंधरा है, और दूसरे में भयभीत प्राणी को दिया हुआ जीवनदान है (दोनों समान है) ।
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