शील
दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो मुद्रण ई-मेल
दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मषीकूर्चकः
चारित्रस्य जलाञ्जलिः गुणगणारामस्य दावानलः ।
सङ्केतः सकलापदां शिवपुरद्वारे कपाटो दृढः
शीलं येन निजं विलुप्तमखिलं त्रैलोक्य चिन्तामणिः ॥

जिसने तीन लोक में चिंतामणि रुप स्वयं के चारित्र्य को विलुप्त किया है, उसने इस दुनिया में अकीर्ति रुप पर्दे के गोत्र में कलंक का पींछा मारा है । चारित्र्य को तिलांजलि याने गुणसमुदाय रुप उद्यान में दावानल, सब आपत्तियों का संकेत, और कल्याणनगर के द्वार पर लगाया हुआ मजबुत कडा ।

 
अमराः किङ्करायन्ते मुद्रण ई-मेल
अमराः किङ्करायन्ते सिद्धयः सह सङ्गताः ।
समीपस्थायिनी संपद् शीलालङकार शालिनाम् ॥

शीलरुपी अलंकार से भूषित इन्सान के, सिद्धों सहित (सब) देव दास बनते हैं, और संपत्ति नजदीक रहनेवाली बनती है ।

 
निशानां च दिनानां च यथा मुद्रण ई-मेल
निशानां च दिनानां च यथा ज्योतिः विभूषणम् ।
सतीनां च यतीनां च तथा शीलमखण्डितम् ॥

जैसे प्रकाश, दिन और रात का भूषण है, वैसे अखंडित शील, सतीयों और यतियों का भूषण है ।

 
अग्नि र्जलं द्विषन्मित्रं मुद्रण ई-मेल
अग्नि र्जलं द्विषन्मित्रं कालकूटं सुधानिभम् ।
सिन्धुः स्थलं गिरिर्भूमिः हेतुः शीलस्य तत्र वै ॥

अग्नि जल जैसा, शत्रु मित्र जैसा, कालकूट (विष) अमृत जैसा, सागर जमीन जैसा, और पर्वत पृथ्वी जैसा बनता है, उस में शील हि कारण है ।

 
न मुक्ताभि र्न माणिक्यैः मुद्रण ई-मेल
न मुक्ताभि र्न माणिक्यैः न वस्त्रै र्न परिच्छदैः ।
अलङ्कियेत शीलेन केवलेन हि मानवः ॥

मोती, माणेक, वस्त्र या पहनावे से नहि, पर केवल शील से हि इन्सान विभूषित होता है ।

 
पृथ्वीं सत्पुरुषं विना न रुचिरा मुद्रण ई-मेल
पृथ्वीं सत्पुरुषं विना न रुचिरा चन्द्रं विना शर्वरी
लक्ष्मी र्दानगुणं विना वनलता पुष्पं फलं वा विना ।
आदित्येन विना दिनं सुखकरं पुत्रं विना सत्कुलम्
धर्मो नैव धृतः सदा श्रुतधरैः शीलं विना शोभते ॥

(जैसे) पृथ्वी सत्पुरुष के बिना रुचिर नहि, रात्रि चाँद के बगैर, दान के गुण बिना लक्ष्मी, फूल और फल के बगैर वनलता, सूर्य के बिना दिन, सुख देनेवाले पुत्र के बिना सत्कुल भी रुचिर नहि । वैसे ही विद्वान लोगों द्वारा आचरण किया हुआ धर्म, बिना शील के शोभा नहि देता ।

 
वह्रिस्तस्य जलायते जलनिधिः मुद्रण ई-मेल
वह्रिस्तस्य जलायते जलनिधिः कुल्यायते तत्क्षणात्
मेरुः स्वल्पशिलायते मृगपतिः सद्यः कुरङ्गायते ।
व्यालो माल्यगुणायते विषरसः पीयूष वर्षायते
यस्याङ्गेऽखिल लोक वल्लभतमं शीलं समुन्मीलति ॥

जिसके अंग में सबको प्रिय ऐसे शील का उदय होता है, उस के लिए अग्नि जल बन जाता है, सागर छोटा सा नाला, मेरु पर्बत छोटी पर्वत शिला जैसा, सिंह हिरन, सर्प फूलमाला, और झहर अमृत वर्षा करनेवाला बन जाता है ।

 
ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य मुद्रण ई-मेल
ऐश्वर्यस्य विभूषणं सुजनता शौर्यस्य वाक् संयमो
ज्ञानस्योपशमः कुलस्य विनयो वित्तस्य पात्रे व्ययः ।
अक्रोधस्तपसः क्षमा बलवतां धर्मस्य निर्व्याजता
सर्वेषामपि सर्वकारणमिदं शीलं परं भूषणम् ॥

ऐश्वर्य का विभूषण सुजनता, शौर्य का वाणीसंयम, ज्ञान का उपाशम, कुल का विनय, वित्त का सत्पात्र पे व्यय, तप का अक्रोध, बलवान का क्षमा, और धर्म का भूषण निखालसता है । पर इन सब गुणों का मूल कारण शील, परं भूषण है ।

 
व्यर्थं मानवजीवनं सविभवं शीलं मुद्रण ई-मेल
व्यर्थं मानवजीवनं सविभवं शीलं विना शोभनम्
व्यर्था शीलगुणं विना निपुणता शास्त्रे कलायां तथा ।
व्यर्थं साधुपदं च नायकपदं शीलं यदा खण्डितम्
सेवाधर्मसमादरो न सुलभः शीलं व्रतं चान्तरा ॥

सुंदर शील के बिना वैभवयुक्त मानवजीवन व्यर्थ है । बिना शील गुण के शास्त्र और कला में निपुणता व्यर्थ है । शील जब खंडित हुआ हो तो साधु की पदवी या नायकपद भी व्यर्थ है । शीलव्रत के आचरण के बिना सेवाधर्म या सन्मान सुलभ नहि ।

 
शौचानां परमं शौचं मुद्रण ई-मेल
शौचानां परमं शौचं गुणानां परमो गुणः ।
प्रभावो महिमा धाम शीलमेकं जगत्त्रये ॥

तीनों लोकों में एक शील ही परम् पवित्र चीझ, गुणों में श्रेष्ठ गुण, महिमा का धाम और प्रभाव है ।

 
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