सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् ।प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनुः ॥ १५ ॥नवीन पल्लव की लालिमा के समान सूर्य की प्रभा और वसिष्ठ की धेनु नन्दिनी दिशाओं को अपने परिभ्रमण से पवित्र करके सायंकाल निलय ( आश्रम ) के लिए लौटी ।
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