रघुवंश
अथ प्रजानामधिपः प्रभाते मुद्रण ई-मेल

अथ प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् । 
वनाय  पीतप्रतिबद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच ॥ १ ॥

रात्रि के बीत जाने पेर यश के धनी, प्रजापालक, राजा दिलीप ने प्रातःकाल सुदक्षिणा द्वारा दी हुई गन्धमाला को ग्रहण करने वाली, दूध पीकर बँधे हुए बछड़े वाली, महर्षि वसिष्ठ की नन्दिनी गौ को वन में चराने के लिए खोल दिया ।

 
तस्याः खुरन्यासपवित्र मुद्रण ई-मेल

तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपांसुलानां धुरि कीर्तनीया ।
मार्ग मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रुतेरिवाथॅ स्मृतरन्वगच्छत् ॥ २ ॥

पतिव्रताऔं में  अग्रगण्य राजा दिलीप की धर्मपत्नी सुदक्षिणा उस नन्दिनी के खुरों के रखने से पवित्र  धूलिवाले मार्ग में वेद के अर्थ के पीछे स्मृति के समान चली ।

 
व्रताय तेनानुचरेण मुद्रण ई-मेल

व्रताय तेनानुचरेण धेनोन्यॅषेधि शेषोप्यनुयायिवगॅः ।
न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा, स्ववीर्यगुप्ता हि मनोः प्रसूति ॥ ४ ॥

व्रत के लिए नन्दिनी के पीछे चलने वाले राजा दिलीप ने शेष नौकरों को भी लौटा दिया । उनके शरीर  की रक्षा के लिए दुसरो के आवश्यकता न थी, क्योंकि मनु की संतान अपने पराक्रम से रक्षित होती है ।

 
स्थितः स्थितामुच्चलितः मुद्रण ई-मेल

स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः ।
जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भुपतिरन्वगच्छत् ॥ ६ ॥

राजा दिलीप उस नन्दिनी के ठहरने पर ठहरते हुए, चलने पर चलते हुए, बैठने पर बैठते हुए, पानी पीने पर पानी पीते हुए, छाया के समान उसके पीछे पीछे चले ।

 
स न्यस्तचिन्हामपि मुद्रण ई-मेल

स न्यस्तचिन्हामपि राजमलक्ष्मीं तेजोविशेषानुमितां दधानः ।
आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदावस्थ इव द्विपेन्द्रः ॥ ७ ॥

छ्त्र चामरादि चिन्हों से रहित होते हुए भी विशेष तेज से अनुमान की जानेवाली राजमलक्ष्मीं को धारण करते हुए वे प्रगट रूप से न दिखाई पड़ने वाली मद रेखा से संयुक्त हाथी के समान मालूम पड़ते थे । 

 
लताप्रतानोद्ग्रथितैः स मुद्रण ई-मेल

लताप्रतानोद्ग्रथितैः स केशैरधिज्यधन्वा विचचार दावम् ।
रक्षापदेशान्मुनिहोमधेनोवॅन्यान्विनेष्यन्निव दुष्टसत्त्वान् ॥ ८ ॥

लतातंतुऔं से गूंथे केश वाले, प्रत्यक्ष चढ़े हुए धनुष को धारण किए वे राजा दिलीप वसिष्ठ ऋषि के धेनु की रक्षा बहाने जंगली दुष्ट जीवों को मानों शिक्षा देते हुए वन में विचरने लगे ।

 
विसृष्टपार्श्वानुचरस्य तस्य मुद्रण ई-मेल

विसृष्टपार्श्वानुचरस्य तस्य पार्श्वाद्रुमाः पाशभृता समस्य ।
उदीरयामासुरिवीन्मदानामालोकशब्दं वयसां विरावैः ॥ ९ ॥

पाश्वॅवर्ती सेवकों को लौटा देने वाले, वरुण के समान उस राजा के अगल बगल के वृक्षों ने उन्मत्त पक्षियों के कलरव से मानों जयकार किया ।

 
मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्सखाभं मुद्रण ई-मेल

मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्सखाभं तमर्च्यमारादभिवर्तमानम् ।
अवाकिरन्वाललताः प्रसूनैराचारलाजैरिव पौरकन्या ॥ १० ॥

और वायुसंचालित नई लताओं ने पास में वर्तमान अग्नि के समान राजा दिलीप के ऊपर बालिकाओं द्वारा धान के समान पुष्पों की वर्षा की ।

 
शशाम वृष्टयाऽपि विना मुद्रण ई-मेल

शशाम वृष्टयाऽपि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः ।
ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वने गोप्तरि गाहमाने ॥ १४ ॥

उस रक्षक राजा के वन में प्रवेश करने पर वनाग्नि वर्षा के बिना ही शांत हो गया, फुल-फलों की वृद्धि विशेषरुप से होने लगी, पशुओं में सबल निर्बल को सत्ता नहीं पाये ।

 
सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि मुद्रण ई-मेल

सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् ।
प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनुः ॥ १५ ॥

नवीन पल्लव की लालिमा के समान सूर्य की प्रभा और वसिष्ठ की धेनु नन्दिनी दिशाओं को अपने परिभ्रमण से पवित्र करके सायंकाल निलय ( आश्रम ) के लिए लौटी ।

 
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