मात्रिक छन्द
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संस्कृत में अधिकतर वर्णिक छन्दो का ही ज्ञान कराया जाता है; मात्रिक छन्दों का कम । फिर भी हम यहाँ तीन मात्रिक छन्दों का परिचय देकर फिर वर्णिक छन्दों का वर्णन करेंगे ।

 
दोहा मुद्रण ई-मेल

संस्कृत में इस का नाम दोहडिका छन्द है । इसके विषम चरणों में तेरह-तेरह और सम चरणों में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं । विषम चरणों के आदि में  ।ऽ । (जगण) इस प्रकार का मात्रा-क्रम नहीं होना चाहिए और अंत में गुरु और लघु (ऽ ।) वर्ण होने चाहिए । सम चरणों की तुक आपस में मिलनी चाहिए । जैसे:

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हरिगीतिका मुद्रण ई-मेल

हरिगीतिका छन्द में प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं और अन्त में लघु और फिर गुरु वर्ण अवश्य होना चाहिए । इसमें यति 16 तथा 12 मात्राओं के बाद होती हैं; जैसे 

।  ।  ऽ  । ऽ ऽ  ऽ ।ऽ   ।  ।ऽ  । ऽ ऽ  ऽ     । ऽ 

मम मातृभूमिः भारतं धनधान्यपूर्णं स्यात् सदा ।
नग्नो न क्षुधितो कोऽपि स्यादिह वर्धतां सुख-सन्ततिः ।
स्युर्ज्ञानिनो गुणशालिनो ह्युपकार-निरता मानवः,
अपकारकर्ता कोऽपि न स्याद् दुष्टवृत्तिर्दांवः ॥

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गीतिका मुद्रण ई-मेल
इस छन्द में प्रत्येक चरण में छब्बीस मात्राएँ होती हैं और 14 तथा 12 मात्राओं के बाद यति होती है । जैसे:

ऽ  । ऽ  ॥  ऽ । ऽ  ऽ  ऽ  । ऽ ऽ ऽ  । ऽ

हे दयामय दीनबन्धो, प्रार्थना मे श्रूयतां
यच्च दुरितं दीनबन्धो, पूर्णतो व्यपनीयताम् ।
चञ्चलानि मम चेन्द्रियाणि, मानसं मे पूयतां
शरणं याचेऽहं सदा हि, सेवकोऽस्म्यनुगृह्यताम् ॥

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