यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी । विभवे यश्च सन्तुष्टः तस्य स्वर्ग इहेव हि ॥
जिसका पुत्र उसके वश है, पत्नी कहा करनेवाली है, और वैभव से जो संतुष्ट है, उसके लिए तो यहीं स्वर्ग है ।
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अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वशश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या षड्जीवलोकस्य सुखानि राजन् ॥
हे राजन् ! अर्थोपार्जन, अरोगित्व, अच्छी लगनेवाली और प्रिय बोलनेवाली पत्नी, अपने आधीन पुत्र, और अर्थकरी विद्या – ये छे जीवलोक के सुख है ।
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वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः । अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥
आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है । घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना हि तप है । जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है ।
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तप्त्वा तपस्वी विपिने क्षुधार्तो गृहं समायाति सदान्न दातुः । भुक्त्वा स चान्नं प्रददाति तस्मै तपो विभागं भजते हि तस्य ॥
तपस्वी वन में तप करके जब भूख से पीडित होता है, तब वह अन्नदाता के घर आता है । वहाँ अन्न लेकर, वह (एक तरीके से) अपने तप का हिस्सा उसे बाँटता है ।
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यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः । तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः ॥
जिस तरह सब जंतु वायु को आश्रित होते हैं, वैसे सब आश्रम गृहस्थ (आश्रम) पर आश्रित हैं ।
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क्रोशन्तः शिशवः सवारि सदनं पङ्कावृतं चाङ्गणम् शय्या दंशवती च रुक्षमशनं धूमेन पूर्णः सदा । भार्या निष्ठुरभाषिणी प्रभुरपि क्रोधेन पूर्णः सदा स्नानंशीतलवारिणा हि सततं धिग् धिग् गृहस्थाश्रमम् ॥
जिस घर में बालक रोते हो, सब जगह पानी गिरा हो, आंगन में कीचड हो, गद्दों में मांकड हो, खुराक रुक्ष हो, धूँए से घर भरा हो, पत्नी निष्ठुर बोलनेवाली हो, पति सदा क्रोधी हो, ठंडे पानी से स्नान करना पडता हो – ऐसे गृहस्थाश्रम को धिक्कार है ।
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सानन्दं सदनं सुताश्च सुधियः कान्ता प्रियभाषिणी सन्मित्रं सधनं स्वयोषिति रतिः चाज्ञापराः सेवकाः । आतिथ्यं शिवपूजनं प्रतिदिनं मिष्टान्नपानं गृहे साधोः सङ्गमुपासते हि सततं धन्यो गृहस्थाश्रमः ॥
घर में आनंद हो, पुत्र बुद्धिमान हो, पत्नी प्रिय बोलनेवाली हो, अच्छे मित्र हो, धन हो, पति-पत्नी में प्रेम हो, सेवक आज्ञापालक हो, जहाँ अतिथि सत्कार हो, ईशपूजन होता हो, रोज अच्छा भोजन बनता हो, और सत्पुरुषों का संग होता हो – ऐसा गृहस्थाश्रम धन्य है ।
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