यदा भूतपृथग्भाव मुद्रण ई-मेल
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३० ॥

जिस क्षण पुरुष भूतों के पृथक – पृथक भावों को एक परमात्मा में स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह ब्रह्म को प्राप्त होता है ।

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