क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं मुद्रण ई-मेल
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥ ३४ ॥

इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञानसे तत्त्वसे जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।

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