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अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च । अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥ ३३ ॥
मैं अक्षरोंमें अकार हूँ और समासोंमें द्वन्द्व नामक समास हूँ, काल में अक्षयकाल (महाकाल) तथा विश्वव्यापी विधाता भी मैं ही हूँ ।
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मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् । कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥ ३४ ॥
मैं सबका संहार करनेवाला मृत्यु और भविष्य का उत्पत्ति हेतु हूँ; तथा स्त्रियोंमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, ध्रृति और क्षमा हूँ ।
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बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥ ३५ ॥
तथा साम में (गायन करनेयोग्य श्रुतिमें) मैं बृहत्साम और छन्दोंमें गायत्री छन्द हूँ तथा महीनोंमें मार्गशीर्ष और ऋतुओंमें वसंत हूँ ।
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द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥ ३६ ॥
मैं छ्ल करनेवालोंमें द्यूत और तेजस्वी पुरुषोंका तेज हूँ । मैं जय हूँ, निश्चय हूँ, और सात्त्विक पुरुषोंका सत्त्व भाव भी मैं हूँ ।
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वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः । मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥ ३७ ॥
वृष्णि कुलोत्पन्नों में मैं वासुदेव हूँ, पाण्डवोंमें धनञ्जय (अर्थात् अर्जुन) हूँ, मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें उशनस् (शुक्राचार्य) कवि भी मैं ही हूँ ।
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दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् । मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥ ३८ ॥
मैं दमन करनेवालोंका दण्ड (दमन करनेकी शक्ति) हूँ, जीतनेकी इच्छावालोंकी नीति हूँ, गुप्त रखनेयोग्य बातोंमें मौन हूँ और तत्त्वज्ञानीयों का ज्ञान हूँ ।
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यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन । न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ॥ ३९ ॥
और हे अर्जुन ! जो सब भूतोंकी उत्पत्तिका बीज है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि चर और अचर कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है, जो मुझसे रहित हो ।
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नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ॥ ४० ॥
हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियोंका अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियोंका यह विस्तार तो तेरे लिये एकदेशसे अर्थात् संक्षेपसे कहा है ।
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यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ॥ ४१ ॥
जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उसको तू मेरे तेजके अंशकी ही अभिव्यक्ति जान ।
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अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ ४२ ॥
अथवा हे अर्जुन ! इससे अधिक जाननेसे (मेरे भिन्न भिन्न रुपोंको जानने से) तेरा क्या प्रयोजन है ? मैं इस सम्पूर्ण जगतको अपनी योगशक्तिके एक अंशमात्रसे धारण करके स्थित हूँ ।
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