श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ ३ ॥
श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप ! इस लोकमें दो प्रकारकी निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है । उनमेंसे सांख्ययोगियों को ज्ञानयोगसे और योगियों को कर्मयोगसे निष्ठा बतायी गयी है ।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ४ ॥
मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको (योगनिष्ठाको) प्राप्त होता है, और न ही कर्मों के त्याग मात्र से सिद्धि (सांख्यनिष्ठाको) प्राप्त कर सकता है ।
यज्ञके निमित्त किये जानेवाले कर्मोंसे अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगने से ही लोग कर्म-बंधनमें पडते हैं । इसलिए हे कौन्तेय ! तू संगरहित होकर केवल यज्ञके निमित्त ही कर्तव्यकर्म कर ।
प्रजापति ब्रह्माने कल्पके आदिमें यज्ञसहित प्रजाओंको रचकर उनसे कहा कि, "तुम लोग इस यज्ञके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम्हें इच्छित फल प्रदान करनेवाली कामधेनु होओ ।"
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