आजका सुविचार

The tragedy of life doesn?t lie in not reaching your goal. The tragedy lies in having no goal to reach.

चिन्ताज्वरो मनुष्याणां क्षुधां निद्रां बलं हरेत् ।
रूपमुत्साहबुध्दिं श्रीं जीवितं च न संशयः ॥

The fever of worry snatches away hunger, sleep, strength, beauty, enthusiasm, mind, wealth and life itself - there is no doubt.

"चिंता" स्वरुप ज्वर (बुखार) भूख, नींद, बल, सौंदर्य, उत्साह, बुद्धि, समृद्धि और स्वयं जीवन को भी हर लेता है ।

 
मत्तः प्रमत्तः उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धः बुभुक्षितः ।
त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश ॥

मद्य पीया हुआ, असावध, उन्मत्त, थका हुआ, क्रोधी, डरपोक, भूखा, त्वरित, लोभी, और विषयलंपट – ये दस धर्म को नहीं जानते (अर्थात् उनसे संबंध नहीं रखना चाहिए) ।

 
आयु र्वित्तं गृहच्छिद्रं मन्त्रमौषध मैथुने ।
दानं मानापमानौ च नव गोप्यानि कारयेत् ॥

आयुष्य, वित्त, गृहछिद्र, मंत्र, औषध, मैथुन, दान, मान, और अपमान – ये नौ बातें गुप्त रखनी चाहिए ।

 
उद्योगः कलहः कण्डू र्मद्यं द्यूतं च मैथुनम् ।
आहारो व्यसनं निद्रा सेवनात् विवर्धते ॥

उद्योग, कलह, खुजली, मद्य, मैथुन, आहार, व्यसन, द्यूत, और निद्रा, सेवन करने से बढते हैं ।

 
पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरस्तथा ।
मनसा वचसा दृष्टया प्रणामोऽष्टाङ्गमुच्यते ॥

हाथ, पैर, घूटने, छाती, मस्तक, मन, वचन, और दृष्टि इन आठ अंगों से किया हुआ प्रणाम अष्टांग नमस्कार कहा जाता है ।

 
"S" for Adi Shankaracharya मुद्रण ई-मेल

There is much written about Adi Shankaracharya, his life and teaching and yet each writing is inadequate to cover the efforts of this great being in restoring the glory to India in line with its true culture and philosophy. Probably one life time is not enough to understand the great character and work of Shri Adi Shankracharya. We owe our existence and cultural identity to this great character that lived only for 32 years but did work that is remembered even today after more than 1000 years.

Sometime around 5th to 8th century A.D., great chaos pervaded all through India in the matter of religion and philosophy. Numerable religious sects arose during this period. Sect after sect, such as Charvakas, Lokayathikas, Kapalikas, Shaktas, Sankhyas, Buddhas and Madhyamikas sprang up. There were ideological differences amongst sects. Chaos and confusion reigned supreme. There was superstition and bigotry. Darkness prevailed over the once happy land of Rishis, sages and Yogis. The once glorious land of the Aryans was in a miserable state. Such were the conditions in the time that just preceded the birth of Shankaracharya.

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"R" for Rabindranath Tagore मुद्रण ई-मेल

Rabindranath Tagore (7 May 1861 – 7 August 1941) also known as Gurudev was a Bengali poet, novelist, musician, educator and playwright, who reshaped Bengali literature and music in the late 19th and early 20th centuries. As author of Gitanjali he won the 1913 Nobel Prize in Literature.

One of the great writers in Modern Indian Literature, he was born in Calcutta into wealthy and prominent family of Debendranath Tagore, a leader of the Brahmo Samaj, which was a new religious sect in nineteenth-century Bengal and which attempted a revival of Hinduism as laid down in the Upanishads. Debendranath Tagore was a religious reformer and a scholar. He tried to combine traditional cultural ideas along with western thinking and provided such an education to young Tagore.

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शिक्षण: एक व्रत मुद्रण ई-मेल
building blocksवैदिक काल में बालकों को शिक्षा की दीक्षा दी जाती थी । तप:स्वाध्याय निरत ऋषि, समाज में यज्ञ, एवं तपोवन में शिक्षण - ऐसे द्विविध रुप से सांस्कृतिक संवर्धन में व्यस्त रहते थे । जैसे एक भी ऋषि अविवाहित नहीं जान पडते, वैसे ही एक भी ऋषि तपोवन या अाश्रम से न जुडे हुए हो - ऐसा भी दिखायी नहीं पडता । समाज के धर्म और नीति-मूल्य रक्षण में व्यस्त ऋषि, राजा और शिक्षण - इन दोनों की ओर विशेष लक्ष्य दिया करते थे; क्यों कि यज्ञ की यथार्थता और समाज का नैतिक अारोग्य, राजा और शिक्षण - इन दोनों पर विशेष अवलंबित होता है । यज्ञ द्वारा समाज और शिक्षण द्वारा भावि व्यक्ति, विशेष रुप से पुष्ट होते थे । संस्कृति और अध्यात्म की अन्योन्यता चरितार्थ होती थी ।

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Indian Ethos in Education मुद्रण ई-मेल

Indian ethosIf I were asked under what sky the human mind has most fully developed some of its choicest gifts, has most deeply pondered on the greatest problems of life, and has found solutions to some of them which well deserve the attention even of those who have studied Plato and Kant, I should point to India.” 

– Friedrich Max Muller

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नाम्नि किम् विशेषम् मुद्रण ई-मेल
“नाम में क्या रखा है !” यह वाक्य कीर्तिविषयक हो तब तो ठीक है, पर वैयक्तिक नामाभिधान के अनुसंधान में अगर हो, तो उसे ज्यादा अर्थ नहीं, क्यों कि नाम तो potential energy जितना शक्तिशाली होता है । पर विशेष विचार किये बगैर यह बात सहसा ध्यान में नहीं अाती ।

अाज के Digital Age में इन्सान की identity एक से अनेक होती जा रही है । जन्म के साथ मिले हुए नाम से शुरू होनेवाली identity, credit cards या smart cards की digital identity में, अथवा वेब साइट्स के usernames में उलज जाती है । बचपन में खिलौनों से खेलनेवाला बालक, बडा होने के बाद भी केवल खेलते ही रहता है; यह है कि उसके खिलौने थोडे sophisticated हो जाते हैं जिन्हें हम gadgets (इलेक्ट्रीक उपकरण) कहते हैं ।

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“P” for Prahlad मुद्रण ई-मेल
Just like Nachiketa, another young character from our scriptures which inspires us to be truthful, fearless and righteous, is the character of Prahlad. Prahlad

There was once a mighty demon king named Hiranyakashipu who wanted to rule all the three worlds of heaven, earth and netherworld. He prayed to Lord Brahma and got a boon from him. He asked that he be killed neither by a man nor a beast, neither in the daylight nor during the night, and in a place which is neither inside nor outside.

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Mohandas Karamchand Gandhi मुद्रण ई-मेल
"Generations to come will scarce believe that such a one as this walked the earth in flesh and blood" – Einstein on Gandhiji. 

Mohandas Karamchand Gandhi or 'Bapu' as he was fondly called is credited with India's independence from British Empire in a battle which saw non-violence as its weapon.

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स्मृति: जरा मेरा भी स्मरण कर लो (२) मुद्रण ई-मेल
(....भाग १ से चालु)
इन प्रश्नोंके उत्तर खोजने के लिए "स्मृति" की सांस्कृितक औरअाध्यात्मिक भूमिका के बारेमें सोचना अावश्यक है, क्योंकि विज्ञान, वाणिज्यऔर प्रचलित धर्म - इनसभी ने यह काम बडी चतुराई से सामान्य मानव के कंधों पर डालदिया है ।

अंतःकरणमें स्मृति का स्थानः

भारतीय दर्शन और संस्कृति मे स्मृति का स्थान विशेष है ।

  • स्मृति का स्थान समजने के लिए अंतर्विश्व और बहिर्विश्व के विविध अंगों को समज लेना चाहिए ।

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स्मृति: जरा मेरा भी स्मरण कर लो मुद्रण ई-मेल
Human Memoryगांधीजी के सिद्धांत और उनकी व्यवहार्यता बहुधा चर्चास्पद रहे हैं, किंतु उनका जीवन प्रामाणिक इन्सान को निश्चित ही प्रेरणादायी लगा है । कभी कभी तो जीवन से भी उनकी मृत्यु ज़ादा प्रभावी लगती है ! किसी भी प्रकार की पूर्वसूचना दिये बगैर इतना सहसा मृत्यु अा मिला, फिर भी संपूर्ण सज्ज; मुख से निकला "हे राम" ! ये कोई अकस्मात वाचक शब्द नहीं थे, बल्कि उपासना वाचक शब्द थे; अंतिम क्षण में उन्हें "ईश्वर" का स्मरण हुअा और येशु की तरह क्षमा धर्म का । राष्ट्र के एवं अन्य कई सेवा-कार्यों में अात्यंतिक व्यस्त होने के बावजुद उन किसी बातों का नहीं, बल्कि ईश्वर का स्मरण होना यह कोई सामान्य घटना नहीं है । "अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्" (८/५) इस गीता वचन की पुष्टी ही यहाँ दिखाई पडती है ।

अर्थात् मृत्यु के प्रति ऐसे प्रतिभाव का कारण था; अाजीवन की हुई "स्मृति" की अाराधना ।

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चाणक्य नीति-दर्पण मुद्रण ई-मेल

Chanakyaनीतिवर्णन परत्व संस्कृत ग्रंथो में, चाणक्य-नीतिदर्पण का महत्वपूर्ण स्थान है । जीवन को सुखमय एवं ध्येयपूर्ण बनाने के लिए, नाना विषयों का वर्णन इसमें सूत्रात्मक शैली से सुबोध रूप में प्राप्त होता है । व्यवहार संबंधी सूत्रों के साथ-साथ, राजनीति संबंधी श्लोकों का भी इनमें समावेश होता है । आचार्य चाणक्य भारत का महान गौरव है, और उनके इतिहास पर भारत को गर्व है । तो इससे पूर्व कि हम नीति-दर्पण की ओर बढें, चलिए पहले इस महान शिक्षक, प्रखर राजनीतिज्ञ एवं अर्थशास्त्रकार के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करें ।

 प्राचीन संस्कृत शास्त्रज्ञों की परंपरा में, आचार्य चणक के पुत्र विष्णुगुप्त-चाणक्य का स्थान विशेष है । वे गुणवान, राजनीति कुशल, आचार और व्यवहार में मर्मज्ञ, कूटनीति के सूक्ष्मदर्शी प्रणेता, और अर्थशास्त्र के विद्वान माने जाते हैं ।

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